HALCHAL INDIA NEWS
गढ़मुक्तेश्वर का एक छोटा सा मोहल्ला आज अपनी पारंपरिक कला के कारण देशभर में जाना जाता है। प्राचीन गंगा मंदिर के समीप स्थित इस क्षेत्र में वर्षों से चटाई निर्माण का कार्य किया जा रहा है, जो यहां के कई परिवारों की आजीविका का प्रमुख साधन बन चुका है।
स्थानीय महिलाओं की मेहनत और कौशल ने इस पारंपरिक उद्योग को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है। मोहल्ले की कई महिलाएं घरों में ही चटाइयां तैयार करती हैं, जिन्हें बाद में विभिन्न बाजारों और राज्यों में भेजा जाता है। इस कार्य ने महिलाओं को रोजगार के साथ आर्थिक आत्मनिर्भरता भी प्रदान की है।
कारीगरों का कहना है कि यह कला पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती आ रही है। परिवार के सदस्य मिलकर चटाई तैयार करते हैं और फिर व्यापारियों के माध्यम से देश के अलग-अलग हिस्सों तक इसकी आपूर्ति की जाती है। गुणवत्ता और टिकाऊपन के कारण इन चटाइयों की मांग लगातार बनी रहती है।
गढ़मुक्तेश्वर में बनने वाली चटाइयों को राष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिल चुकी है। विभिन्न धार्मिक और सामाजिक आयोजनों में इनका उपयोग किया जाता है। बड़े आयोजनों में अस्थायी शिविरों और टेंटों में भी इन चटाइयों की मांग रहती है।
स्थानीय कारीगरों के अनुसार हर महीने बड़ी मात्रा में चटाइयों की बिक्री होती है, जिससे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिल रही है। महिलाओं की लगन और पारंपरिक कौशल ने इस हस्तशिल्प को जीवित रखने के साथ-साथ गढ़मुक्तेश्वर का नाम देशभर में पहुंचाने का काम किया है।
आज यह उद्योग केवल रोजगार का साधन नहीं, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।
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