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करोड़ों की योजनाएं बेअसर, गंगा में अब भी बह रहा गंदा पानी


HALCHAL INDIA NEWS

गढ़मुक्तेश्वर। गंगा को स्वच्छ रखने के लिए बनाए गए सरकारी इंतजाम गढ़मुक्तेश्वर में कागजों तक सीमित नजर आ रहे हैं। नगर पालिका क्षेत्र के वार्ड नयाबांस में करोड़ों रुपये की लागत से स्थापित सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) अपेक्षित उद्देश्य पूरा करने में असफल साबित हो रहा है। नगर की आबादी से निकलने वाला सीवर और नालों का दूषित पानी बिना शोधन के सीधे गंगा नदी में मिल रहा है।

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि प्रयागराज में माघ मेले का आयोजन शुरू हो चुका है, जहां करोड़ों श्रद्धालु गंगा स्नान के लिए पहुंचते हैं, इसके बावजूद गढ़ क्षेत्र में गंगा को प्रदूषण से बचाने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं। मौके पर केवल औपचारिकता के तौर पर एक मशीन चालू रखी गई है, जिससे पानी को बिना शुद्ध किए नालों के माध्यम से नदी में छोड़ा जा रहा है।

वर्ष 2010 में जल निगम द्वारा यह एसटीपी इस मंशा से बनाया गया था कि नगर का गंदा पानी ट्रीटमेंट के बाद ही गंगा में प्रवाहित हो, लेकिन वर्तमान में प्लांट लंबे समय तक बंद पड़ा रहता है। इसका नतीजा यह है कि सीवर लाइनों और नालों का गंदा पानी सीधे गंगा की धारा को प्रदूषित कर रहा है।

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि एसटीपी के संचालन और रखरखाव में लगातार लापरवाही बरती जा रही है। कई बार बिजली आपूर्ति बाधित होने का हवाला देकर प्लांट को बंद रखा जाता है, जबकि वैकल्पिक व्यवस्था की जिम्मेदारी पहले से तय होनी चाहिए थी। स्नान पर्व और धार्मिक आयोजनों के दौरान यह स्थिति और भी गंभीर हो जाती है।

इसके अलावा नगर में करीब 64 करोड़ रुपये की लागत से विकसित की गई ड्रेनेज प्रणाली भी पूरी तरह चरमरा गई है। कई मोहल्लों में सीवर लाइनें जाम हैं, मैनहोल ओवरफ्लो हो रहे हैं और सड़कों पर गंदा पानी फैल रहा है। दुर्गंध से लोगों का रहना दूभर हो गया है। बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं को सबसे अधिक परेशानी उठानी पड़ रही है, वहीं त्वचा, पेट और सांस से जुड़ी बीमारियों का खतरा भी बढ़ रहा है।

गंगा में लगातार मिल रहा यह दूषित पानी पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा है और धार्मिक आस्था के लिहाज से भी बेहद चिंताजनक स्थिति पैदा कर रहा है। माघ मेले के दौरान जब गंगा की पवित्रता पर देशभर की नजरें टिकी हैं, तब गढ़मुक्तेश्वर से हो रहा प्रदूषण प्रशासनिक दावों की पोल खोलता नजर आता है।

इस संबंध में जल निगम के अधिशासी अभियंता विनय रावत का कहना है कि नाला टैपिंग के माध्यम से पानी को फिल्टर किया जा रहा है। सभी मशीनें एक साथ नहीं चलाई जातीं, बल्कि तय समय के अनुसार पानी को संग्रहित कर बाद में शोधन प्रक्रिया अपनाई जाती है।